डर लगता है Dar Lgta Hai

अब इस सामान सी ज़िन्दगी से डर लगता है,
सब कुछ ठीक होने से डर लगता है,
तेरा दिया एक गम ही तोह था मेरे पास,
उसके कही खो जाने से डर लगता है।
सब कुछ हसीं होने से डर लगता है,
सुनहरी सुबह से डर लगता है,
तेरे निशाँ मेरे इस उजड़ेपन में जो बस्ते है,
इन निशानों के मिटने से डर लगता है।
जब जा रही थी तू, तोह तूने सोचा भी नहीं होगा,
कुछ खो रहा हु मै या कुछ पा रहा हु मै,
वो छोड़ जाने का इरादा तेरा नाकाम किया है,
तेरी यादों को ही हमसफ़र किया है। 
पर इन यादों का नशा कुछ उतरने लगा है,
तेरी मुहोब्बत का असर कुछ उतरने लगा है,
तेरे ख़याल के अब न आने से डर लगता है,
अब,तेरी यादों के मरने से पहले मर जाने से डर लगता है।


-Krishh (With an extra 'h')






Ab is saman si zindagi se dar lgta hai,
Sb kuch theek hone se dar lgta hai,
Tera diya ek gum hi toh tha mere paas,
Uske kahi kho jane se dar lgta hai...
Sb kuch haseen hone se dar lgta hai,
Sunehri subah se dar lgta hai,
Tere nishan mere is ujadepan me jo baste hai,
In nishanon k mitne se dar lgta hai...
Jb jaa rahi thi tu, toh tune socha bhi nahi hoga,
Kuch kho raha hu mai, ya kuch paa raha hu mai,
Vo chhod jane ka irada tera nakaam kiya hai,
Teri yadaon ko hi humsafar kiya hai,
Pr in yaadon ka nasha kuch utrne laga hai,
Teri mohobbat ka asr kuch utrne laga hai,
Tere khayaal k ab na aane se dar lgta hai,
Ab, teri yaadon k mrne se pehele mr jane se dar lgta hai...


-Krishh (With an extra 'h')

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